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         मैं बबूलों हूँ

 
शूलों भरे वसन ओढ़े हूँ
फिरभी तुम सबको जोड़े हूँ
क्यों तुम खुद को भरमाते हो
छू कर मुझको घर जाते हो
मैं मर्यादा हूँ घर घर की

स्वागत का
पहला उसूल हूँ
मैं बबूल हूँ

घर स्पर्श करें सब मुझको
मैं सबका परिवार रहा हूँ
रात दिवस चौकस रहता हूँ
घर का पहरेदार रहा हूँ

मैं घर मन्दिर के मस्तिष्क का
शीश चढा सा
प्रथम फूल हूँ
मैं बबूल हूँ

गर्मी शीत घनी वर्षा को
सहने के प्रारूप दिये हैं
मेहनतकशं ने मुझको देखो
कितने सुन्दर रूप दिये हैं

दॄढ विश्वास अटल हूँ सबका
खरी नियति का
असल मूल‌ हूँ
मैं बबूल हूँ

- कृष्ण भारतीय
१ मई २०२०

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