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जीवन रहे अशोक
 

कल अशोक से हुई हमारी
मोबाइल पर बात

कैसे हो बतलाओ
सुनकर भर्रायी आवाज़
कालिदास तो रहे नहीं अब
कौन कहे सरताज
दुख का रोना रोने वाले
पूछ रहे हालात

पुष्पों का रस पीने वाले
दिखा रहे हैं पीर
कामी-नामी करें तमाशा
लिये खड़े शमशीर
कन्दर्पी उपमाएँ देकर
जलते सारी रात

बदली होगी दृष्टि तुम्हारी
बदले होंगे वंश
राजमहल से झोपड़ियों तक
रहा मिटाता दंश
सुख के बदले दुख देते हो
करते हो आघात

शोक मिटाना मूल सदा से
नहीं मनाता शोक
छोड़ विषाद हर्ष में जीना
जीवन रहे अशोक
सीता के चरणों मे नत हूँ
जग को देता मात

- डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'  

१ अगस्त २०१८

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