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आ भाई सूरज
इस बस्ती मे
उजियारे के जीवन में

उम्र की चादर की
कहाँ गए
धूप की चादर
धूप ने
उदास छाँव
आसीस अंजुरी भर
लेटी है माँ

संकलन में—
नई भोर
नया उजाला

 

इस बस्ती में

जब-जब छुपकर वार करेगा
तब-तब वो मुस्काएगा।
बैठ सामने चारण बनकर
गुण जीभर कर गाएगा।।

दौर मुसीबत का जब होगा
साथ रहेंगे बेगाने।
वह अपनों का लगा मुखौटा
दूर कहीं छिप जाएगा।।

घाव लगे तन-मन पर लाखों
बैरी मरहम ला देंगे।
उसके वश में जितना होगा
उतना नमक लगाएगा।।

इस बस्ती में बैठके प्यारे
प्यार वफ़ा की बात न कर।
बंजर दिल की इस धरती पर
उपवन कौन खिलाएगा।।

अपनी चादर कितनी मैली
समय नहीं जो देख सके।
उजली चादर जिनकी दिखती
उस पर दाग़ लगाएगा।।

२६ मई २००८

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