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वासंती दोहे

कविताओं में—
ज़रूरी है
बचकर रहना
बेटियों की मुस्कान
मैं घर लौटा

मुक्तकों में—
सात मुक्तक

क्षणिकाओं में—
दस क्षणिकाएँ

गीतों में—
आ भाई सूरज
इस बस्ती मे
उजियारे के जीवन में

उम्र की चादर की
कहाँ गए
धूप की चादर
धूप ने
उदास छाँव
आसीस अंजुरी भर
लेटी है माँ

संकलन में—
नई भोर
नया उजाला

 

बेटियों की मुस्कान

बेटियों की मुस्कान–
जैसे गूँज उठा
भोर में साम -गान
जैसे वन में तिरती
बाँसुरी की तान

जैसे भरी दुपहरी में
बरगद की छाया
जैसे लू के बाद
बह उठी शीतल बयार ।

मत छीनो यह मुस्कान
इसके छिन जाने पर
रूठ जाएँगी ऋचाएँ,
डूब जाएँगे सातों स्वर,
रूठ जाएगी शीतल छाया,
बयार बनेगी
अंगारों की बौछार
झुलस जाएगी सारी सृष्टि ।

24 जून 2007

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