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दो ग़ज़लें
नाम गंगा का बदल दो
नाम गंगा का बदल दो यह नदी बदली हुई है
पाप धो-धो कर सभी के यह बड़ी गंदली हुई है
भूल जाओ थी कभी यह साफ़ सुथरी-सी सुनीरा
शहरियों के पान की अब पीक-सी उगली हुई है
बहुत मुर्दे खा चुकी है मरघटों की यह सहेली
रोज़ गन्दी नालियां पीकर इसे मतली हुई है
अब न धारा या तटों की गंदगी में फर्क कोई
अंग पहले ही गले अब कोढ़ में खुजली हुई है
पूजते क्या ख़ाक सब जो डालते कचरा नदी में
कह रहे देवी जिसे पैरों तले कुचली हुई है
पास शहरों के गुज़रते ही हमेशा सूख जाती
इस कदर आबादियों से यह डरी दहली हुई है
संग रहकर आदमी के रोग सब 'गौतम' लगे हैं
होश में रहती न भटकी रास्ता पगली हुई है
अंधेरे बहुत हैं
अंधेरे बहुत हैं तभी हैं उजाले
बुझा दीप समझे न देखे न भाले
यहाँ कब अँधेरा मिटे कौन जाने
चलो कुछ बचा लें दिलों के उजाले
चमन आज़माइश करे मौसमों की
मगर और काँटों पे दिल न उछाले
छिपाया जिसे आप दिल ने नज़र से
निकलते नहीं आँसुओं के निकाले
किसी के लिए फूल बन जाएँ कांटे
किसी के लिए फूल बन जाएँ छाले
कहीं रेशमी ख्वाब सचमुच सजे हैं
कहीं रोज़ फाके व ग़म के निवाले
कहो मत नहीं जायका ज़िन्दगी में
मुहब्बत के अब भी बचे हैं मसाले
मुलाक़ात जब भी हुई यह हुआ है
कभी हम संभालें कभी वह संभाले
सूना है कि 'गौतम' ने मुँह सी लिया है
करेगा न अब और हीले-हवाले
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